जब बच्चा ऐसे सवाल पूछे जिनके जवाब आपके पास नहीं हैं — तब क्या करें
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gifted — यानी वह बच्चा जिसका दिमाग़ औसत से अलग तरीक़े से काम करता है। यह अच्छे marks लाने वाला बच्चा नहीं है — यह सोचने का एक अलग तरीक़ा है।
GiftedKids.in की ओर से
दिन भर के बाद एक ख़ास तरह की थकान होती है — सवालों से नहीं, उनमें पकड़े जाने से। हमारे यहाँ बड़े होते हुए यही सीखा जाता है कि जिस बड़े को जवाब नहीं आता, उसका रुतबा कम हो जाता है। इसलिए जिस सवाल का जवाब न आए, वह सवाल नहीं लगता — अपनी कमी लगती है।
यह लेख GiftedKids.in ने भारतीय परिवारों के लिए लिखा है — किसी अंग्रेज़ी लेख का अनुवाद नहीं। इसका आधार Dr Inderbir Kaur Sandhu, PhD (Cambridge) का clinical काम है, जो भारत के बाहर की practice से आता है। भारतीय school, marks और परिवार का संदर्भ GiftedKids.in का अपना है। पूरा विवरण · उनका मूल अंग्रेज़ी लेख यहाँ।
यह शिकायत माता-पिता बहुत करते हैं। और इसके पीछे थकान से ज़्यादा एक और चीज़ होती है — यह डर कि कहीं यह कुछ ग़लत होने का संकेत न हो।
जिज्ञासा हर बच्चे में होती है। लेकिन gifted बच्चों के सवाल आमतौर पर ज़्यादा गहरे, ज़्यादा अमूर्त और ज़्यादा ज़िद्दी होते हैं। वे जानकारी जमा नहीं कर रहे होते। वे यह समझने की कोशिश कर रहे होते हैं कि दुनिया चलती कैसे है।
सवाल इसलिए नहीं आ रहे कि बच्चे को कम पता है। इसलिए आ रहे हैं कि वह जुड़ाव ढूँढ़ रहा है।
ऐसे बच्चे "क्यों", "कैसे" और "अगर ऐसा हो तो" वाले सवाल पूछते हैं। space, समय, सही-ग़लत, science, लोग ऐसा क्यों करते हैं — इन पर वे अपने साथियों से बरसों पहले सोचने लगते हैं।
यह रटने की कोशिश नहीं है। यह उस स्तर का तर्क है जो उनकी उम्र से आगे है।
यह हिस्सा GiftedKids.in का अपना है, क्योंकि यह हमारे ढाँचे की बात है।
हमारे यहाँ जवाब देना अधिकार से जुड़ा है। teacher जवाब देता है, बच्चा सुनता है। जो बच्चा class में पलटकर पूछ ले, उसे जिज्ञासु नहीं, बदतमीज़ कहा जाता है। और घर पर वही दबाव माता-पिता पर आ जाता है — बच्चे के सामने "मुझे नहीं पता" कहना कमज़ोरी लगने लगता है।
एक बात और। भारत में सवाल का जवाब अब सबसे आसानी से phone से मिलता है, और वहीं सबसे बड़ी चूक होती है। बच्चे को जवाब मिल जाता है, लेकिन यह कभी नहीं सिखाया जाता कि किस जवाब पर भरोसा करना है और किस पर नहीं। search करना आना काफ़ी नहीं है।
Dr Inderbir Kaur Sandhu का सबसे आम अनुभव यही है — माता-पिता पर हर जवाब जानने का दबाव होता है। और उनका कहना है कि इसकी ज़रूरत ही नहीं।
सबसे अच्छी पढ़ाई अक्सर तब होती है जब बड़ा व्यक्ति कह देता है — "मुझे नहीं पता, चलो साथ पता करें।" इस एक वाक्य से बच्चा तीन चीज़ें सीखता है: जिज्ञासा, सोचने का तरीक़ा, और यह कि सीखना कभी ख़त्म नहीं होता।
जो बच्चे बहुत सवाल पूछते हैं, वे परेशान करने के लिए पूछते हैं।
बहुत से gifted बच्चे इसलिए पूछते हैं कि उनकी दिलचस्पी सच्ची है और उन्हें एक बात को कई तरफ़ से देखना अच्छा लगता है।
एक बात याद रखने लायक़ है — बच्चे को ऐसे माता-पिता की ज़रूरत नहीं है जिन्हें सब पता हो। उसे ऐसे माता-पिता की ज़रूरत है जो पता करने से पीछे न हटें।
"मुझे नहीं पता" कहकर बात ख़त्म कर देना अलग बात है। "मुझे नहीं पता, चलो देखें" कहना उससे बिलकुल उलटी बात है। पहले में दरवाज़ा बंद होता है, दूसरे में खुलता है — और बच्चा दोनों का फ़र्क़ साफ़ समझता है।
जिस घर में यह दूसरा वाक्य आम हो जाता है, वहाँ बच्चा जवाब से ज़्यादा क़ीमती चीज़ लेकर बड़ा होता है — यह भरोसा कि जो नहीं पता, वह पता किया जा सकता है।

ये सब अंग्रेज़ी में हैं। gifted education पर भरोसेमंद हिंदी सामग्री लगभग नहीं है — यही एक वजह है कि यह site बन रही है।
जो बच्चा लगातार सवाल पूछता है, वह आमतौर पर ठीक चल रहा है। ध्यान देने की बात तब है जब सवाल आना बंद हो जाएँ, या उनमें घबराहट आ जाए, या बच्चा समझ ले कि पूछने से डाँट मिलती है। यह बदलाव अंदाज़े से समझने के बजाय किसी जानकार से समझ लेना बेहतर है।
consultation के लिए संपर्क करेंconsultation Dr Inderbir की अपनी practice Mind Path के साथ होती है। GiftedKids.in clinical सवालों का जवाब नहीं दे सकता।